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KARMYOGI

Yashpaul Nirmal

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29 March 2023 गी पूरा कीता गेआ
आईएसबीएन नंबर : 9789391414023
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कर्मयोगी अर्थात कर्म में लीन व्यक्ति। योगा कर्मो किशलयाम, योग: कर्मसु कौशलम्। गीता के अनुसार कर्मों से संन्यास लेने अथवा उनका परित्याग करने की अपेक्षा कर्मयोग अधिक श्रेयस्कर है। कर्मों का केवल परित्याग कर देने से मनुष्य सिद्धि अथवा परमपद नहीं प्राप्त करता। मनुष्य एक क्षण भी कर्म किए बिना नहीं रहता। सभी अज्ञानी जीव प्रकृति से उत्पन्न सत्व, रज और तम, इन तीन गुणों से नियंत्रित होकर, परवश हुए, कर्मों में प्रवृत्त किए जाते हैं। मनुष्य यदि बाह्य दृष्टि से कर्म न भी करे और विषयों में लिप्त न हो तो भी वह उनका मन से चिंतन करता है। इस प्रकार का मनुष्य मूढ़ और मिथ्या आचरण करनेवाला कहा गया है। कर्म करना मनुष्य के लिए अनिवार्य है। उसके बिना शरीर का निर्वाह भी संभव नहीं है। अज्ञानी मनुष्य जिस प्रकार फलप्राप्ति की आकांक्षा से कर्म करता है उसी प्रकार आत्मज्ञानी को लोकसंग्रह के लिए आसक्तिरहित होकर कर्म करना चाहिए। इस प्रकार आत्मज्ञान से संपन्न व्यक्ति ही, गीता के अनुसार, वास्तविक रूप से कर्मयोगी हो सकता है। आज आपके सामने हिंदी-डोगरी के लोकप्रिय साहित्यकार यशपाल निर्मल जी द्वारा डोगरी में अनूदित 'कर्मयोगी' प्रस्तुत किया जा रहा है। यह मूलतः श्री गणेश दास जी की जीवनी है। Read more 

KARMYOGI

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